“यतीम”

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प्रीतिका हुड्डा जाखड़
पेड़ की जड़ में ही अगर दीमक लगी हो तो चाहे दरख्त आसमां को भी क्यों ना छू ले, तेज हवाओं में गिर ही जाता है।।कुदरत का ये नियम प्रकृति के साथ साथ मनुष्य पर भी लागू होता है, इंसानों का बचपन स़ूकून और प्रेम में ना गुजरा हो तो मुश्किल वक्त में वे रेत के घरोंदे से ढह जाते हैं।
निर्जला का जन्म कहां हुआ वो खुद नहीं जानती थी बस जब से होश संभाला था तो यतीमखाने की दर-ओ -दीवारों को ही घर जाना था।।।

हमें हमेशा वही तो चाहिए होता है जो हमारे पास नहीं होता जब भी निर्जला अपनी Dormaintry की खिड़की से खुले आसमां को ताकती तो बस भगवान से अपने लिए एक घर मांगती।

घर…..अपना घर…।
सतीश जब पहली बार निर्जला की सहेली की शादी में उससे मिला तो उसने पूछा था… निर्जला… मेरे ईंट दिवारों के मकान को घर बना दो…. ।

दोनों तरफ सन्नाटा था और फिर दोनों ने खामोशी से एक दूसरे का हाथ थाम लिया।।।सतीश ने सालों इस घड़ी का इंतजार किया था और शायद निर्जला ने भी।
भारत पाकिस्तान की सीमा पर युद्ध के हालात थे और जब से सतीश की पोस्टिंग श्रीनगर हुई थी निर्जला डरी रहती थी।।।। टेलिफोन की घंटी बजी और जिसका डर था वहीं हुआ था ।।।।।।।।सतीश के अंतिम संस्कार में निर्जला ने आखिरी बार उसके गले लगते हुए कहा “एक बार यतीम को फिर यतीम कर गए तुम”।।।।
चारों तरफ भारत माता की जय-जयकार थी और निर्जला उस निष्ठुर आसमां वाले की तरफ तकती वहीं राख के ढेर के पास बैठी रही।।।।।
#प्रीतिका

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